संगीत
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संगीत शान्ति का तट है। आजकल तनाव का युग है। मनुष्य विभिन्न साधनो के द्वारा शान्ति की खोज करता है। परन्तु शान्ति दुर्लभ होती जा रही है।
प्राचीन युग पर दृष्टिपात करे तो पांएगे कि राजा-महाराजाओ के मनोरंजन का प्रमुख साधन संगीत ही था। दूसरी तरफ भक्तजन भी भक्ति-संगीत को प्रमुखता देते थे।
पुराने भक्तजनो मीरा,नामदेव,सूरदास इत्यादि के चित्रो को देखो सबके हाथो मे वाध्य-यंत्र
दिखाई पडेगे। कैवल्य समाधि लगाना कठिन है। भक्ति-संगीत मे डूबकर भक्त की सहज मे ही भाव समाधि लग जाती है।
वर्तमान युग मे भी संगीत की प्रमुखता तो है परन्तु डिस्को संगीत की। शास्त्रीय-संगीत विदाई लेता दिखाई पडता है। भक्ति-गीत,भजन केवल मन्दिरो मे यदाकदा लोग सुन लेते है। फिर भी बीजनाश नही, जो लोग शास्त्रीय-संगीत,भक्ति-गीत,भजनो मे लगन रखते है उनका स्वागत है।
परमसंगीताचार्य योगीश्वर श्री कृष्ण का ध्यान करे, जिन्होने बाँसुरी का अविष्कार इस प्रकार से किया-एक बार आप बाल सखाओ, सखियो के साथ बैठे थे।
श्री दामा प्रभु को वीणा सुना रहे थे। सखियो ने प्रभु से कहा-भगवन आप भी वीणा बजाओ। श्री कृष्ण मुस्कराते हुए उठे और समीप से एक सूखे बाँस की लकडी का छेदन कर एक नए प्रकार के वाध्य-यंत्र का निर्माण किया। भगवान ने कहा यह बाँस से बनी है सो इसका नाम बाँसुरी होगा। यह मुँह से फूँक मार कर बजायी जाएगी। फिर श्री भगवान ने ज्यों ही प्रथम बार बाँसुरी बजाना आरम्भ किया गोपिया,ग्वाले नाचने लगे। आकाश से देवगण फूल बरसाने लगे। भोले बाबा डमरू, नारद जी वीणा,इन्द्र मृदंग बजाने लगे। देव,दानव,गर्न्धव,कन्नर,सारा ब्रहामण्ड संगीत-रस मे झूम उठा। मुनिगण समाधि त्याग गोपियो का रूप धारण का नृत्य करने लगे। इस प्रकार से बाँसुरी का अविष्कार हुआ।
आइये रसेश्वर श्री कृष्ण के मन्त्र का जाप-
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नम:
करते हुए संगीताध्यन आरम्भ करे।
संगीत शान्ति का तट है। आजकल तनाव का युग है। मनुष्य विभिन्न साधनो के द्वारा शान्ति की खोज करता है। परन्तु शान्ति दुर्लभ होती जा रही है।
प्राचीन युग पर दृष्टिपात करे तो पांएगे कि राजा-महाराजाओ के मनोरंजन का प्रमुख साधन संगीत ही था। दूसरी तरफ भक्तजन भी भक्ति-संगीत को प्रमुखता देते थे।
पुराने भक्तजनो मीरा,नामदेव,सूरदास इत्यादि के चित्रो को देखो सबके हाथो मे वाध्य-यंत्र
दिखाई पडेगे। कैवल्य समाधि लगाना कठिन है। भक्ति-संगीत मे डूबकर भक्त की सहज मे ही भाव समाधि लग जाती है।
वर्तमान युग मे भी संगीत की प्रमुखता तो है परन्तु डिस्को संगीत की। शास्त्रीय-संगीत विदाई लेता दिखाई पडता है। भक्ति-गीत,भजन केवल मन्दिरो मे यदाकदा लोग सुन लेते है। फिर भी बीजनाश नही, जो लोग शास्त्रीय-संगीत,भक्ति-गीत,भजनो मे लगन रखते है उनका स्वागत है।
परमसंगीताचार्य योगीश्वर श्री कृष्ण का ध्यान करे, जिन्होने बाँसुरी का अविष्कार इस प्रकार से किया-एक बार आप बाल सखाओ, सखियो के साथ बैठे थे।
श्री दामा प्रभु को वीणा सुना रहे थे। सखियो ने प्रभु से कहा-भगवन आप भी वीणा बजाओ। श्री कृष्ण मुस्कराते हुए उठे और समीप से एक सूखे बाँस की लकडी का छेदन कर एक नए प्रकार के वाध्य-यंत्र का निर्माण किया। भगवान ने कहा यह बाँस से बनी है सो इसका नाम बाँसुरी होगा। यह मुँह से फूँक मार कर बजायी जाएगी। फिर श्री भगवान ने ज्यों ही प्रथम बार बाँसुरी बजाना आरम्भ किया गोपिया,ग्वाले नाचने लगे। आकाश से देवगण फूल बरसाने लगे। भोले बाबा डमरू, नारद जी वीणा,इन्द्र मृदंग बजाने लगे। देव,दानव,गर्न्धव,कन्नर,सारा ब्रहामण्ड संगीत-रस मे झूम उठा। मुनिगण समाधि त्याग गोपियो का रूप धारण का नृत्य करने लगे। इस प्रकार से बाँसुरी का अविष्कार हुआ।
आइये रसेश्वर श्री कृष्ण के मन्त्र का जाप-
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नम:
करते हुए संगीताध्यन आरम्भ करे।

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